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लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व, अस्तित्व में आई यह जटिल और सामंती जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज के प्रत्येक घटक को दूषित किया है। तथागत बुद्ध से लेकर डॉ. बाबासाहब अंम्बेडकर तक और संत कबीर से ज्योतिबा फूले, रामास्वामी पेरियार आदि तक का जातिविहीन समाज की स्थापना करने का अविरल प्रयास जारी रहा है। रास्ट्रीय दलित अधिकार मंच भी जातिनिर्मूलन करने के दिशा में प्रयत्नशील है।

हम मानते हैं कि जाति व्यवस्था सिर्फ दलितों का ही नही बल्कि समग्र भारतवर्ष का प्रश्न है। लेकिन अभी भी इस मुद्दे पर भारतीय समाज संवेदनशील नही है. इसी कारण से आज भी समाज और राजनीति जातिरूपी विषाणु से मुक्त नही हो पा रहा है। आज देश के दलितों का ख़ास कर दलित स्त्रियों की जो हालत है इससे हम बखूबी वाक़िफ़ हैनॅशनल क्राइम रेकर्ड ब्यूरो के मुताबिक भारत में हर रोज 4 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होते है, 2 दलितों की हत्या होती है, हर 18 मिनट में इस देश के कई भागों में दलितो पर जातिगत अत्याचार होता है। हमारा समाज जातिनिर्मूलन की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय संघ जैसे जातिवादी और कौमवादी घटकों की चपेट मे आ रहा है.
 वर्त्तमान राजनीति परिदृश्य में ऐसे लक्षण दिखाई दे रहे है कि देश को लोकतांत्रिक व्यवस्था को आगे बढ़ाने के बजाय पुनः मध्ययुगीन सामंती व्यवस्था की ओर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है. जैसा कि खैरलांजी हत्याकांड, मिर्चपुर हत्याकांड, रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या, थानग़ढ में AK-47 से गोलियां बरसाना, दिनदहाडें सरेआम भरे बाज़ार में गौमाता की नौटंकी के नाम पर ऊना (गुजरात) में दलितों की चमड़ी उधेडना हो, ये कुछ घटनायें और संघ के लोगो का यह कहना की संविधान में भले ही धर्मनिरपेक्ष समाज और राज्य की अवधारणा हो हम तो हिंदू राष्ट्र ही बनाएंगे, साध्वी प्राची का कहना की 4 बच्चे पैदा करो, इस देश के प्रधानमन्त्री का कहना की हमारे पास मनुष्य का धड़ और हाथी के मस्तक को जोड़ने की तकनीक थी. उपरोक्त बयान हमारे समाज में मध्ययुगीन जातिवादी और सामंती मूल्यों को प्रस्थापित करने का षड्यंत्र है। 1991-92 से देश ने अपनाई हुई वैश्वीकरण-उदारीकरण की नीति के कारण दलित, आदिवासी, किसान, कर्मचारी और श्रमजीवी वर्ग अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही है. जैसाकि 1938 में मण्माड़ के रेलवे कामदार को संबोधित करते हुए डॉ बाबासाहब आंबेडकर ने कहा था कि "ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद” दोनों हमारे शत्रु है, आज इनदोनों शत्रुओं के खिलाफ हमे संघर्ष करने की जरूरत है. इस का मतलब यह है कि हमें आज मोहन भागवत और मुकेश अंबानी के खिलाफ संघर्ष करना पड़ेगा. दूसरे अर्थों में कि मोहन भागवत और उनका संघ परिवार जो मनुवादी विचारधारा चला रहे हैं उसके सामने हमें एकजुट होकर तर्कशक्ति और वैज्ञानिक अभिगम के प्रगतिशील सोच को आगे बढाना पडेगा.
  हमे देश की जनता के सामने ठोस रूप से यह बात रखनी चाहिए की हमें हिन्दू राष्ट्र नही बल्कि विभिन्न जाति और धर्म के लोग सौहार्दपूर्ण सम्बंधो के साथ जी सके जैसा कि संविधान में कल्पना की गई है, ऐसा एक सेक्युलर-धर्मनिरपेक्ष समाज का निर्माण करना है। साथ साथ संविधान के आमुख में जो अवधारणा है वैसा समाजवादी लोकतंत्र खड़ा करना है. जिसके केंद्र में 120 करोड़ जनता हो न कि मुठ्ठीभर मोहन भागवत और मुकेश अंबानी जैसे लोग. इसीलिए हमने नारा दिया की हमारी यह लड़ाई आत्मसम्मान की लड़ाई है और साथ ही अपने अस्तित्व की भी लड़ाई है. एक तरफ दलित आंदोलन को अस्पृश्यता समाप्ति और जातिगत हिंसा के सामने डटकर मुकाबला करना पड़ेगा तो दूसरे तरफ तीव्रता और ऊर्जा के साथ रोटी-कपड़ा-मकान, शिक्षा और आरोग्य, बेरोजगारी, कॉन्ट्रेक्ट पद्धति की समाप्ति, शिक्षा-आरोग्य के निजीकरण की समाप्ति और जमीन के अधिकारो के लिए भी लड़ना पड़ेगा. पेट खाली हो, सर पर छत ना हो, बच्चों को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य न उपलब्ध हो तो ऐसे में सिर्फ आत्मसम्मान की लड़ाई से काम नही चलेगा. इसी प्रकार पेट तृप्त हो, रहने को घर हो, अच्छी शिक्षा और आरोग्य भी मिला हो परंतु कोई "हट साले दलित" कहकर या किसी और तरीके से हमारे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाये वह भी नही चलेगा.
हम समाज में सामाजिक एवं आर्थिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध ! इस विचार को आगे ले जाने हेतु ऊना आंदोलन से आज दिन तक हम सम्पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ दिन-रात मिशन में लगे हुए है. इसीलिए हमने नारा दिया "गाय की दुम तुम रखो, हमे हमारी जमीन दो". इस नारे ने पुरे देश में सामाजिक संघर्ष को एक धार देने का काम किया है. इसका कारण यह है कि इस नारे में गाय को तथाकथित माता बनाकर जो मनुवादी राजनीति हो रही है उसे चुनौती देते हुए उसके बदले सामाजिक बदलाव और उत्थान की राजनीति करने का आह्वाहन करता है.
साथ ही हमें क्या चाहिए यह एजेंडा भी साफ़ है. लेकिन जमीन के साथ-साथ अपने सामाजिक न्याय के साथ-साथ विकास के लिए दूसरे कुछ मुद्दे उठाने पड़ेगें और संघर्ष करना पड़ेगा ऐसी सोच के साथ हमने निर्धारित किये गये 15 मुद्दों पर भी कार्य करना सोच रहे है और इसी दिशा में प्रवृत भी हो चुके है।
साथियों, इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं है कि राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच सिर्फ इसी मुद्दे पर काम करेगा. जैसा कि ऊपर में उल्लेखित है हमारा अंतिम लक्ष्य जातिनिर्मूलन ही है और वह ही रहेगा। हम मानते हैं कि संसदीय चुनाव की राजनीति का महत्व है, पर वह ही सर्वस्व नही है, क्योंकि जनता की ताकत से बड़ी कोई ताकत नही है, इतिहास गवाह है कि जनता सड़को पर उतरकर अपने संघर्ष से बड़ी-बड़ी हिटलरशाही सरकारों को भी झुकने के लिए मजबूर किया है. इसका मतलब है कि संसदीय चुनावी राजनीति मे भी हमारा हस्तक्षेप होगा, साथ साथ हमलोग सड़को पर भी संघर्ष करेंगे. हम सलाम करते है डॉ बाबासाहब आंबेडकर को जिन्होंने शिड्युल कास्ट फेडरेशन, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (स्वतंत्र मजदूर पक्ष) बनाकर दलितों और वंचितो की स्वतंत्र राजनीति को जन्म दिया और साथ में हम उस बाबासाहब को भी सलाम करते हैं कि जिन्होंने महाड़ में सत्याग्रह किया, रेलवे के कामदारो सहित हजारो-लाखो मज़दूरों के संघर्ष में जुड़कर "पूंजीवाद मुर्दाबाद" का नारा लगाया और ऐतिहासिक संघर्ष का बिगुल फूंका.

साथियों, इस बात को हमे समझना चाहिये कि कल अगर हम राजनीतिक सत्ता हासिल कर लेगें तो इसका मतलब यह कत्तई नही होगा की जातिनिर्मूलन अपनेआप हो जाएगा और दूसरी तरफ चुनावी राजनीति से दूर रहने में भी भलाई नही है.
हमलोग गुजरात में सड़को पर व्यापक संघर्ष कर रहे हैं और इसके साथ-साथ पूरे देश की सडकों पर भी आंदोलन खड़ा करना होगा और इसी आंदोलन में से दलितो-पीड़ितो-वंचितो-शोषितों की स्वतंत्र राजनीति उभरकर आए ऐसे प्रयास करेगे.

बाबासाहेब ने कहा था की मनुवाद मुर्दाबाद के साथ ही पूंजीवाद मुर्दाबाद का भी नारा लगाना पड़ेगा और मनुवाद के साथ ही पूंजीवाद का भी खात्मा करने की सूत्र भी ढूंढनी पड़ेगी. इसके लिए बाबासाहेब के साथ ही इस देश के और दुनिया के दूसरे महान चिंतक, कर्मशील, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिकों की सोच और विचारधारा से प्रेरित एक प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच का समाज का निर्माण का रास्ता भी अग्रसर होगा.
संक्षेप में सब को एक समान रोटी-कपड़ा-मकान मिले, मान-सम्मान मिले और मानव के द्वारा मानव के शोषण का अंत हो. इसी समझ के साथ राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच की ओर से आपके सामने एक छोटी प्रस्तावना प्रसारित क़र रहे है कि आगामी दिनों में हम राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच का मेनिफेस्टो रखेंगे जिसमें इस देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनीति एवं सांस्कृतिक मुद्दों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की जायेगी.

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